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गुनहगार बच्चे Guilty Kids

गुनाहगार बच्चे

होते हैं 
बच्चे गुनहगार होते हैं
वो गुनहगार होते हैं क्योंकि 
वो मासूम होते हैं
उनका गुनाह है कि 
वे व्यापार के नियम नहीं समझते
उनकी भोली-भाली नज़र में
नहीं होता कोई दुश्मन
उनकी शीरी जुबाँ से
नहीं होती किसी की बुराई
उनका गुनाह है कि 
उनके खिलौने किसी का घर नहीं जलाते
यह भी उन्हीं गुनाह है कि
उन्हें अपने परिवार का
नाम मिला
धर्म मिला
ज़ात मिली
उनका गुनाह है कि वे
अपने माँ-बाप की आँखों के तारे हैं
अपनी बस्ती का गुरूर और
अपने मुल्क का मुस्तकबिल हैं
बहुत लम्बी है उनके गुनाहों की फेहरिस्त
एक गुनाह यह भी है कि 
वो किसी के खुदा के प्यारे हैं
उनका गुनाह है कि वो
मजहब
जात 
जुबाँ और 
मुल्क की सरहद को नहीं समझते
इन्हीं गुनाहों की सज़ा हम उन्हें देते हैं
निशाना बनाते हैं उनके स्कूलों 
और खेल के मैदानों को
उनकेे खिलौनों और किताबों को
क्योंकि हम समझदार हैं
हम जो कुछ करते हैं 
उसका अर्थ होता है
उससे अर्थ पैदा होता है
गलत हैं वो लोग जो बच्चों के मरने का गम करते
आँसू बहाते हैं, चीखते-चिल्लाते हैं
वो बेगुनाह होते तो क्यों
वो किसी की तलवार की प्यास बुझाते
किसी की तोप के निशाने पर आते 
होते हैं बच्चे गुनहगार
इन गुनहगारों को सज़ा देना
हमारा फर्ज है, कत्तर्व्य है, 
हमारा धर्म है और
हम ‘धर्म-परायण’ हैं

नज़र

हर जगह खून के धब्बे नज़र आते हैं 
यहाँ रक्षक भी मुझे भक्षक नज़र आते हैं 

ये खादी नहीं गरीबों का कफ़न है दोस्तों 
ये रहनुमाँ भी मुझे दुश्मन नज़र आते हैं 

कैसे आख़िर मुआफ़ करूँ इन्हें यारों 
ये काबिल मुझे क़ातिल नज़र आते हैं 

क्यों करूँ दुआ कैसे फ़रियाद 
ये देवता मुझे पत्थर नज़र आते हैं 

मुश्किल है यकीं करना क्योंकि  
ये भेड़ें मुझे भेड़िये नज़र आते हैं 

हिदायत

दीवार पर कुछ न लिखें, ये इबारत लिख दी
इस हिदायत ने उनकी उसे खराब कर दिया

कृपया शांति बनाए रखें, चीखकर बोले वो
कोशिश ने खामोशी को दरकिनार कर दिया

किसी से कहना नहीं, कुछ यूँ  फुसफुसाये
इसी बात ने हमें उनका हमराज़ कर दिया

वाह क्या बात है, क्या बात है, झूम उठे वो
इस वाहवाही ने फिर हमें  हैरान कर दिया

कैसे हैं आप? हमने यह सवाल कर लिया
खामोश रहे और  हमें खबरदार कर दिया

सच कह रहा हूँ, फिर से ज़ोर देकर बोले यूँ 
हमने भी हर फसाने पर ऐतबार कर लिया

और सुनाओ कुछ नया कहो, पूछते हैं वो
उनकी पूछताछ ने हमें शायराना कर दिया

उफ्फ! क्या करते हो? कुछ ढंग का किया करो
नसीहतों ने ही ज़माने की हमें नाकारा कर दिया

चलो चलें, कहीं बहुत दूर चलें, खयाल आया
ख्वाहिशों ने हमें थोड़ा मुसाफ़िराना कर दिया

स्थान

जिसकी  जो जगह उसको वहीं पे रहने दो 
आग को चूल्हों और चिराग़ों में ही रहने दो 

रोटियाँ सेंकने को तो तंदूर बहुत हैं 
घोंसलों को टहनियों ही पे रहने दो 

होती है ख़ाक हर शय जब जलती है 
ठंडा है आहन इसे ठंडा ही रहने दो 

ताड़ तिल का बनाना तो बड़ी बात नहीं 
किस्सा न बनाओ इसे मामूली ही रहने दो 

भूल चुका हूँ जिसे न दोहराओ वो बात 
मोहरा न बनाओ मुझे इंसां ही रहने दो 

यूँ तो

यूँ तो अँधेरा पहले भी हुआ करता था 
पर उम्मीद की किरण फिर भी दिखा करती थी 

यूँ तो झगड़े पहले भी हुआ करते थे 
पर आपसी प्यार नहीं मारा करता था 

यूँ तो भूख पहले भी हुआ करती थी 
पर इंसान जानवर नहीं बना करता था 

यूँ तो मौतें पहले भी हुआ करती थीं 
पर ज़मीर नहीं मारा करता था 

पतझड़ पहले भी आया करता था 
पर सावन नहीं मारा करता था 

बसंत पहले भी रूठ जाया  करता था
पर कोयल की कूक नहीं मरा करती थी 

इमारतें पहले भी गिरा करती थीं 
पर आशियानें नहीं टूटा करते थे 

धारा

बह जाना चाहते हो,
तो बह जाओ 
पर ख्याल रहे
धारा  के साथ बहने वाले 
तुम अकेले न होओगे
असंख्य होंगे 
जो दिन रात
मशीन के पुर्जे की तरह 
खटते-खपते
जीवन शेष होने से पहले 
खुद शेष हो जाएंगे
सचेत नहीं रहे तो 
संभव है तुम भी 
भीड़ का हिस्सा बन जाओ 
भेड़ों में एक और गिनती बन जाओ 
अपनी विलक्षणता और सक्षमता 
के बावजूद तुम कहीं खो जाओ 
और फिर आगे-पीछे-मध्य 
का भेद गौण हो जाये
संघर्ष थम जाए
फिर कैसे सृजन करोगे 
धारा के  विपरीत न बहोगे 
तो 
संघर्ष कैसे करोगे 
क्योंकि 
संघर्ष नहीं तो 
सृजन भी नहीं 

टीम

तुमने कहा था 
तुम्हें सफर पर जाना था 
और तुम कश्ती लेकर 
निकल पड़े
अकेले  
लेकिन तुम भूल गए थे 
कि तुम समंदर में उतरे थे
और कश्तियाँ
समुद्र के थपेड़े सहने को न बनी थीं 
सागर में तो जहाज़ ही विचरते हैं,
तुम  भूल गए थे
कि
लम्बी दूरी  के लिए जहाज़ होता है
और जहाज़
कोई अकेला नहीं चला सकता
उसके लिए तो चाहिए
"एक टीम"

शिकायत

शिकायत मुझे भी है
आप से,
उन से,
खुद से,
शिकायत मुझे भी है

ये मायूस चेहरे और आलम-ए-रुसवाई
ये खौफनाफ मंज़र और दहशत-ए-तन्हाई
ये बेदिली और अजनबी माहौल,
जज़्बात-ए-इंसा हुए बेमोल,
इस माहौल से शिकायत मुझे भी है

बेबसी का पतझड़ और आंसुओं का सावन,
ये लाचार-बेआस-बेबस निगाहें,
बेआब मछली-सी तड़प और दर्दनाक आहें
इस दर्द की नाइत्तेफ़ाक़ी से,
शिकायत मुझे भी है

हालात हमारे एक से पर चेहरे एक-दूजे के तकते
राह नहीं मालूम, सहारा एक-दूसरे का खोजते
कभी मैं निराश तो कभी वह आस छोड़ता
इस आशा निराशा के खेल से
शिकायत मुझे भी है

ये नौजवानों की भटकन, ये मासूमों की धड़कन
ये बर्बाद जवानी, ये बेसहारा बुढ़ापा
वो उम्मीद की किरण, ये झूठे वादों का जाल
इस जालसाज़ी, फरेब से,
धर्म के आक़ाओं से,
देश के रहनुमाओं से,
शिकायत मुझे भी है
आप से,
उन से,
खुद से